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बंधन से स्वतंत्रता है पूर्ण मनुष्य के विकास की ओर पहला कदम

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 यह कहना गलत नहीं होगा कि जिस प्रकार  प्रकाश और ऊष्मा प्रसारित करना सूर्य का स्वाभाविक गुण है उसी तरह प्रत्येक जीव का विकास उसके क्रमानुसार हो वह उसका स्वाभाविक गुण है | अब बंधन चाहें शारीरिक हो या मानसिक, बंधन सदा स्वाभाविक विकास को अवरुद्ध तथा विकास की सर्जनशील शक्ति को कम ही करेगा | इस बात को हम एक उदाहरण द्वारा  सटीकता से  समझ सकते हैं, जिसमें दो पक्षी जो समान जाति, समान अवस्था तथा समान रंग -रूप के हैं परन्तु उन दोनों पक्षियों को उड़ने के लिए अलग -अलग स्थान  दिया जाता है, इनमें एक पक्षी को पूरी तरह पिंजड़े की तरह बंद हॉल दिया जाता है जबकि दुसरे पक्षी को खुले आसमान में उड़ने को स्वतंत्र छोड़ दिया जाता है | हम एक निश्चित समयावधि के बाद दोनों पक्षियों को देखें तो पाएंगे कि जिस पक्षी को उड़ने के लिए  पिंजड़े नुमा हॉल दिया गया, अब अगर उस पक्षी को खुले आसमान में उड़ने के लिए छोड़ा जाये तो वह हॉल की ऊँचाई जितना ही  उड़ कर वापस जमीन पर बैठ जाएगा जबकि दुसरे पक्षी की उड़ने की शक्ति असीमित हो चुकी है | यहाँ पर यह बात तो स्वतः स्पष्ट है कि बंधन ...