जीवन में नित्य सौंदर्य बोध पर एक दृष्टांत
हम सौंदर्यबोध पर मानव स्वाभाव का मंथन करें तो हमें जो मूल रूप से मिलेगा वह उसकी इंद्रिय प्रधान अनुभूतिओं द्वारा ग्रसित भाव होगा जो अवश्यम्भावी क्षणभंगुर है जिसमें नित्यता की छाया केवल मृगमरीचका के समान है | अगर मैं साफ शब्दों में कहूं तो मनुष्य में यह सौंदर्य बोध भौतिकता के साथ जुड़ा हुआ है तथा जिसमें नित्यता का आभाव संलिप्त है | नित्यता को हम कुछ इस प्रकार भी समझ सकतें हैं जैसे बर्फ को छुएं तो हमें सदा इसके ठंडक होने का ही अहसास होगा और अग्नि को छुएं तो हमें सदा इसके गरम होने का ही अहसास होगा जो इनके अपरिवर्तनशील गुंण को दर्शाता है, यही अपरिवर्तनशील गुंण बर्फ और अग्नि के स्वाभाव को नित्यता से संलिप्त करता है | उपरोक्त तथ्यों की रोशनी में यह बात स्वतः ही स्पष्ट होती है कि अगर मानव में सौंदर्य बोध बाहरी भौतिक घटकों के स्थान पर जीवन की निरन्तरता के बोध पर आश्रित हो तो मानव में सौंदर्य बोध निरंतर हो सकेगा जिसके उपरांत एक ऐसे विराट मानव स्वाभाव का सर्जन होगा जो समस्त मानव में 'एक ही चेतना का विस्तार ' का अनुभव...