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मनुष्य जीवन 'पथ -प्रदर्शक' के रूप में

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हम लगभग हर मार्ग पर प्रकाश स्तंभ को देखते हैं, जहाँ अंधकार होने पर प्रकाश की रोशनी में हम अपने मार्ग को सहज ही देख पाते हैं।  जिस प्रकार एक प्रकाश स्तंभ मुसाफिर को अपने गंतव्य तक पहुँचने मे मदद करता है, उसी तरह एक व्यक्ति का जीवन-दर्शन भी समाज को युग युगांतर तक मानवता के उत्थान हेतु मार्ग प्रशस्त करता है, जब उस व्यक्ति का सम्पूर्ण जीवन  समष्टि भाव से ओत -प्रोत हो |  समष्टि भाव को हम सूर्य के जीवन चक्र द्वारा भी सटीकता से समझ सकते हैं, सूर्य अपनी गति के क्रमानुसार सम्पूर्ण गोचर जगत को अपनी ऊष्मा तथा रोशनी बिना किसी भेद -भाव के सर्वत्र सामान रूप से प्रदान करता है |  अगर हम मानव जीवन के इतिहास में महापुरुषों के जीवन दर्शन को देखें तो हमें उनके चिंतन -मनन में समष्टि भाव ही दिखेगा | समष्टि भाव से ओत -प्रोत मानव चेतना ने सर्वदा अन्य मनुष्यों के सुख -दुःख, आशा -निराशा, प्रसन्नता -अप्रसन्नता, हंशना -रोना  इत्यादि को अपना ही माना है, या इसे ऐसे भी कह सकते हैं जैसे अन्य पुरुष रोता है तो ये दुखी होते हैं, अन्य पुरुष खुश होता है तो ये...