हमारे जीवन में त्योहारों का महत्त्व, प्रथम भाग
आज हमारे जीवन में त्योहारों का महत्त्व इतना हो गया है जितना साँस लेने का महत्त्व फरक इतना है साँस लिए बिना हम एक समय तक ही जीवित रह सकते जो हम अच्छी तरह समझते है परन्तु त्योहारों के बिना हम जीवित तो रह सकते हैं परन्तु यह जीवन कुछ ऐसा ही है जिसमें हमारी जीवन ऊर्जा लगातार घट रही है और शायद ही हम इसे सत -प्रतिसत समझ सकें | लगभग आज हम त्योहारों में अन्तर्निहित संदेशों को अंगीकार करने में असमर्थ हैं क्योंकि आज हमारी समूल मानसिकता त्यौहार को मूल रूप में मनाने की वजाय हम ढोंग तथा श्रेष्ठता प्रदर्शित करने के चलते त्यौहार को भी अपने सामाजिक रूतबे को बढ़ाने के प्रतीक के रूप में ही देखते हुए केवल बाहरी रूप में ही मनाते है | यह मानसिकता हमारे स्वाभाव में एक ऐसे बीज का बीजारोपण करेगी जिसके उपरांत हम दोहरी जिंदगी जीने को बाध्य होंगे, जिसमें हमारे स्वाभाव में द्वन्द , बहरुपियापन, अशांति तथा जीवन के प्रति नकारात्मक नजरिया आदि जैसे जीवन मूल्यों की प्रधानता होगी | वास्तव में त्यौहार हमारे जीवन में एक ऐसे...